बाइबिल की 52 कहानियाँ

बाइबिल की 52 कहानियाँ

Learn the basic structure, stories, and characters of the Bible.

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उत्पत्ति का पहला अध्याय सम्पूर्ण बाइबिल के लिये मूल-भूत अध्याय है। यह हमें केवल यह ही नहीं बताता है कि सारी चीजों का आरम्भ कैसे हुआ, परन्तु यह इस बात की बुनियादी शिक्षा भी देता है कि परमेश्वर कौन है और हम परमेश्वर से कैसे सम्बन्धित हैं। इतिहास और विज्ञान के द्वितीय मुद्दों पर तर्क वितर्क न करके, उत्पत्ति का 1 अध्याय हमें बताता है कि हमंे अपनी आखें स्वर्ग की ओर लगानी चाहिये। जो परमेश्वर की महिमा का अद्भुत बयान करता है।.

Lectures

Lecture 21

यशायाह 52-53 अध्याय में हमें मसीह की मृत्यु का एक सबसे सटीक धर्म वैज्ञानिक दृष्टिकोण मिलता है। यशायाह एक ऐसे दास के बारे में भविष्यवाणी करता है जो आने वाला है, जिसको परमेश्वर हमारे पापों के बदले दण्डित करेंगे। जाहिर है कि यह भविष्यवाणी यीशु के विषय में है। यहाँपर हम सीखते हैं कि ऐसा कोई पाप नहीं है जिसे परमेश्वर क्षमा नहीं कर सकता, और शान्ति हमारे अन्दर से नहीं आती परन्तु बाहर यानी परमेश्वर से आती है।

Lecture 22

मीका ने तीन समूह वाली भविष्यवाणी की जिन्हें हम हाय (न्याय) और सुख (बहाली) से जानते हैं। इस्राएलियों का ऐसा विश्वास था कि उन्हें बाहरी तरीकों से आराधना करनी थी और फिर वे पूरे सप्ताह अपनी मर्जी से चल सकते थे। इसी कारण उन पर न्याय आया परन्तु इस न्याय के साथ परमेश्वर ने उन्हें भविष्य में बहाल करने की प्रतिज्ञा भी की।

Lecture 23

होशे ने उन लोगों की भविष्यवाणी की जो लगातार पाप में जीवन बिता रहे थे। उनके पापों ने उन्हें मूर्तिपूजा में गिराकर विलासिता के पाप में ढकेल दिया। यहाँ तक कि पाप के तलवे से जब उन्होंने पर्याप्त दण्ड का अनुभव कर लिया, परमेश्वर उन्हें अभी भी माफ करने के लिये विद्यमान है। पापियों को ”वैश्या“ कहा गया है। यानी विश्वासघाती जीवन।

Lecture 24

हबक्कूक के अन्दर यह सवाल है कि दुष्ट लोग क्यों फलफूल रहे हैं जबकि धर्मी लोग बड़ी दुर्दशा में पड़े हैं। उसके प्रश्न से ऐसा लगता है कि परमेश्वर न्यायी है कि नहीं, क्योंकि हबक्कूक विश्वास से प्रश्न पूछता है परमेश्वर उसके प्रश्न का जवाब यह कह कर देता है कि इन्तजार करो। आखिर में दुष्टों को दण्ड मिलता है और धर्मियों को ईनाम। बीच में यह बात प्रगट होती है कि धर्मी जन धर्मी परमेश्वर पर विश्वास से जीवित रहेगा।

Lecture 25

यिर्मयाह और यहेजकेल ने बन्धुवाई के पहले व बन्धुवाई के दौरान भविष्यवाणी की जब परमेश्वर के लोग बेबीमलोनियों के द्वारा पराजित हो गए थे तो उन्होंने परमेश्वर के न्याय के साथ-साथ आशा की प्रतिज्ञा का भी प्रचार किया। आशा तो नयी वाचा थी जिसमें परमेश्वर की व्यवस्था पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा उनके हृदयों पर लिखी जाएगी।

Lecture 26

विलापगीत की पुस्तक यह सिखाती है कि पाप के लिये परमेश्वर के धैर्य का अन्त हो जाता है। यह एक राष्ट्रीय विलाप है जिसमें इस्राएल पाप के प्रति गहरे दुःख को व्यक्त करता है। इसका आरम्भ पाप के कारण के प्रति ईमानदार होकर दूसरों को दोषी न ठहराकर अपने आप को दोषी इहराना है। लेकिन निष्कर्ष में वे परमेश्वर में अपने विश्वास को दिखाते हैं जो पापों को क्षमा करता है।

Lecture 27

पीछे उत्पत्ति 3:15 में परमेश्वर ने यह प्रतिज्ञा की थी कि वह पाप के लिये कुछ इन्तजाम करेगा। पुराना नियम यह दर्शाता है कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा पर कार्य कर रहा है, एक ऐसी प्रतिज्ञा जो आखिरकार यीशु में पूरी हुई। परन्तु लोकप्रिय अपेक्षा के विपरीत यीशु इन्सान से बहुत कुछ बढ़कर थे। वह पूर्णरूप से परमेश्वर थे और पूर्णरूप से मानव भी थे। परन्तु केवल इन सच्चाइयों को जान लेना ही काफी नहीं है परमेश्वर के साथ सम्बन्ध बनाकर चलने के लिये आपको परमेश्वर की आशीष अवश्य प्राप्त करनी होगी।

Lecture 28

पुराना नियम एक प्रतिज्ञा के साथ में समाप्त होता है - कि परमेश्वर एलिय्याह को भेजेगा ताकि वह लोगों को आने वाले मसीहा के लिये तैयार करे। एलिय्याह यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के रूप में आता है जो लोगों को पश्चाताप के बारे में सिखाकर तैयार करता है। और बड़े आश्चर्य की बात यह है कि एक यहूदी के रूप में जन्म लेने का कोई फायदा नही है, और उन्हें भी यह सीखना पड़ा कि यदि उन्हें परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना है तो उनके पास परमेश्वर को देने के लिये कुछ भी नहीं है।

Lecture 29

शायद मसीहियों के द्वारा प्रयोग किया जाने वाला सबसे प्रचलित शब्द है ”नए सिरे से जन्म“ लेना या ”फिर से जन्म लेना।“ यह बात यहूदी अगुवे नीकुदेमुस की कहानी से निकल कर आती है। यीशु उसे बताते हैं कि अगर उसे परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना है तो वह स्वाभाविक रीति से या अपने कार्योें के द्वारा वह प्रवेश नहीं कर सकता है। केवल परमेश्वर के आत्मा का अलौकिक कार्य ही हमें नया बनाता है। यही नया जन्म है इसी से हमें उद्धार प्राप्त होता है बाइबल के सबसे प्रचलित पद यूहन्ना 3:16 में यह बात समझायी गयी है।

Lecture 30

क्या आप परमेश्वर के द्वारा धन्य होना चाहते हैं ? यीशु बताते हैं कि यह किस प्रकार से होता है, जो यीशु का प्रचलित पहाड़ी उपदेश है उसके आरम्भ में प्रभु ने आठ बातें बतायी हैं। आम धारणा के विपरीत आशीष अपनी आत्मिक कमजोरी को पहचानने और अपने पापों पर शोक करने से आती है। और इसका परिणाम नम्र होना, हृदय शुद्ध होना, और मेल मिलाप के खोजी होना है। संसार की क्या प्रतिक्रिया होगा ? वह आपको सताएगा और यह भी आपके लिये आशीष है।

Lecture 31

यीशु सीखाते है कि हमारी प्रार्थना हमारे स्वर्गीय पिता की तरफ मुड़ने से आरम्भ होती है, जिसमें हमें उनकी महिमा की चाहत हो, और उनके राज्य की बढ़ोत्तरी हो, और हमारी शारीरिक और आत्मिक आवश्यकताओं के लिये उस पर सम्पूर्ण निर्भरता में हमारे प्रवेश के साथ समाप्त होती है। यह प्रार्थना मुख्य रूप से परमेश्वर के बारे में है।

Lecture 32

चिन्ता इस बात के भ्रम को लाती है कि हमारे पास भी कुछ नियन्त्रण है और चिन्ता से भी कुछ प्राप्त किया जा सकता है। परन्तु यह ऐसा कुछ भी नहीं करती है। चेलों को परमेश्वर पर अटूट विश्वास रखना चाहिये। जब हम देखते हैं कि परमेश्वर अपनी सृष्टि की देखभाल कैसे करता है तो हम इस बात को समझ सकते हैं कि वह हमारी भी देखभाल करेगा। हमारा ध्यान परमेश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज होनी चाहिये और बदले में वह हमारी सारी जरूरतों को पूरा करेगा।

Lecture 33

मसीह के आने से बहुत साल पहले परमेश्वर ने मूसा से कहा था कि उसका नाम ”मैं हूँ है।“ यीशु वास्तव में इसी नाम महान मैं हूँ को अपने लिये चुनते हैं वह इस प्रकार बताते हैं, जैसे जीवन की रोटी मैं हूँ, जगत की ज्योति मैं हूँ। त्रिएकता का रहस्य, कि एक परमेश्वर है तौभी परमेश्वर में तीन है पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा। यह समझना कठिन है हमें परमेश्वर के बारे में सब कुछ जानने की उम्मीद नहीं करनी चाहिये।

Lecture 34

जब यीशु हमसे कहते हैं कि मेरे पीछे चलो, तो किसी एक व्यक्ति ने कहा है कि आओ और मरो। अपनी व्यक्तिगत महात्वकाक्षाओं के लिये मर जाना, और प्रतिदिन वैसे जियें जैसे आप अपने लिये मर गए हो और प्रभु के लिये जियें। स्वर्ग में केवल चेले ही होंगे।

Lecture 35

सबसे महत्वपूर्ण और बड़ा कार्य आप क्या कर सकते हैं? परमेश्वर हमसे मुख्य रूप से क्या चाहता है? यह है कि हम अपनी सम्पूर्णता से उससे पे्रम करें। हमारा प्रेम भावनात्मक अवश्य होना चाहिये (केवल आज्ञाकारिता ही नहीं) और व्यक्तिगत होना चाहिये (कि हम परमेश्वर से प्रेम करे न कि उससे सम्बन्धित वस्तुओं से)। यदि हम परमेश्वर से प्रेम करते हैं तो हमें अपने पड़ोसी से भी अवश्य पे्रम करना चाहिये। 

Lecture 36

शिष्य लोग दो प्रमुख घटनाओं की अपेक्षा में थे: मन्दिर का विनाश और यीशु का दोबारा आगमन, इसके चिन्ह और चेतावनियाँ होगी ताकि वे यरूशलेम से भाग सकें और यह घटना 70 ई०पू० में घटी परन्तु यीशु दोबारा कब आएँगे इसके लिये कोई चिन्ह और चेतावनी नहीं दी गई है और इस युग का अन्त कब होगा। चेलों की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वे जाने कि यह कब होगा - यहाँ तक कि यीशु भी नहीं जानते हैं परन्तु तैयार होकर जीवन बिताए हमेशा तैयार रहें।

Lecture 37

यीशु ने अपनी मृत्यु और पुनरूत्थान से पहले जो शिक्षा दी उनमें से बहुत बातों के साथ उन्होंने अपने चेलों को पवित्र आत्मा के आगमन के बारे में बताया, जो आकर संसार के उसके पापों के लिये और संसार को यीशु की धार्मिकता को दिखाने के लिये, और संसार को आने वाले न्याय के विषय में निरूत्तर करेगा। हम जानते हैं कि यह ”आत्मा“ पवित्र आत्मा है जो त्रिएकता का एक व्यक्ति है।

Lecture 38

क्रूस से पहले उद्धार का सबसे बड़ा कार्य इस्राएलियों को मिस्र से छुटकारा दिलाना था और इस घटना के उत्सव को मनाने के लिये परमेश्वर ने फसह के पर्व का उत्सव ठहराया, परमेश्वर के उस बड़े अनुग्रह पूर्ण कार्य को जब उसने इस्राएलियों के घरों को छोड़कर मिस्र देश के सारे पहिलौठों को मारा, इस बड़े उत्सव को मनाना था। और अब परमेश्वर अपने पुत्र को क्रूस पर मार करके सबसे बड़े उद्धार के कार्य को करने जा रहा है। मसीहियों को पीछे मिस्र की तरफ देखकर नहीं परन्तु यीशु की मृत्यु और उसके दोबारा आगमन को देखकर फसह का पर्व मनाना है।

Lecture 39

यीशु की मृत्यु और पुनरूत्थान केवल यीशु के जीवन का ही नहीं परन्तु इतिहास के उस बिन्दु की भी पराकाष्ठा है। यीशु क्रूस पर मरे ताकि हम परमेश्वर के मित्र बन जाएँ और कब्र से जी उठने के द्वारा यीशु ने मृत्यु पर विजय हासिल की। मन्दिर का वह परदा जो परमेश्वर और मनुष्य के बीच दूरी का एक चिन्ह था वह ऊपर से नीचे तक दो भागों में बट गया और अब हम सीधे परमेश्वर से सम्बन्ध रख सकते हैं।

Lecture 40

पृथ्वी पर यीशु का अन्तिम कार्य अपने चेलों को महान आदेश देना था। उनका प्रमुख कार्य चेले बनाना है। उन्हें सुसमाचार का प्रचार करके, नए चेले बनाने है, उनको बपतिस्मा देना है, और यीशु ने जितनी भी बातें सिखाई है उन्हें मानना सिखाकर उन्हें पूर्ण रूप से समर्पित चेले तैयार करने हैं। क्योंकि परमेश्वर सबके ऊपर राज्य करता है हमें यह अवश्य करना है क्योंकि वह हमें कभी नहीं छोड़ेगा, और हम यह कर सकते हैं।

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Frequently Asked Questions

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In the Foundations and Academy programs, we recommend taking the classes in the order presented, as each subsequent class will build on material from previous classes. In the Institute program, the first 11 classes are foundational. Beginning with Psalms, the classes are on specific books of the Bible or various topics.

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