31. प्रभु की प्रार्थना

यीशु सीखाते है कि हमारी प्रार्थना हमारे स्वर्गीय पिता की तरफ मुड़ने से आरम्भ होती है, जिसमें हमें उनकी महिमा की चाहत हो, और उनके राज्य की बढ़ोत्तरी हो, और हमारी शारीरिक और आत्मिक आवश्यकताओं के लिये उस पर सम्पूर्ण निर्भरता में हमारे प्रवेश के साथ समाप्त होती है। यह प्रार्थना मुख्य रूप से परमेश्वर के बारे में है।

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